Monday, April 16, 2012

पहली बारिश

कल गर्मी की पहली बरखा हुई थी
कितने दिनों बाद वो मिट्टी फिर से नम हुई थी

कई वृक्ष जो सूख चले थे
कई खेत थे जो बंजर हो चले थे

एक आशा थी जो डूब रही थी
एक परिभाषा थी जो कुछ सोच रही थी

कब वो मेघ आएगा , जो कुछ
जर्जर है उसको सींच के जाएगा

उस झोपड़ी की दीवार चटक के फट गयी थी
कितने जीवन थे जो बारिश की एक बूँद को तरस रहे थे

बाहर खड़ा वो प्रहरी कुत्ता भी समझ चुका था
प्यासे पक्षिओं की तरह वो भी शांत हो चला था

जीवन म्रत्यु में सामने लगा था, एक मेघ
ही था जो ये ढलाव थाम सकता था

आशा ने फिर वो सांस ली
जीवन को जीवन की फिरसे आस दी

देर ही सही फिर वो बादल आया
आशा, खुशियाँ और जीवन की वो वर्षा लाया

आज सब हरा तो नहीं पर सूखा भी नहीं
कल फिर मेहनत खेत जोतेगी और हरियाली लाएगी


Sunday, April 15, 2012

रात की बात


शिकवा अगर जिंदगी से रेहता, तो 
तकिये के नीचे तेरा वो ख़याल न होता

आँखें तो मेरी ज़ुबा हैं, पर 
लाख पूछने पे भी कोई जवाब मिला कहाँ है

ये तो रात थी जो साथ निभाती गयी
बोझल आँखें भी तेरा ही मूँ ताकती रहीं

एक ख़ामोशी थी जो बोहत कुछ केह रही थी
लेकिन ये अखें भी तो वही सब सेह रहीं थीं

ग़म की चादर हटा के देखा तो कुछ खोया हुआ था
वो शायद एक सपना था जो मैं संजोये हुए था

कुछ मोती थे जो पलंग के पास बिखरे थे
ये वही थे जो तुने मुझको दिए थे

आले में जली लौ भी अब बुझ चली थी, लेकिन
तेरी याद की रौशनी कम होने का नाम नहीं ले रही थी

खिड़की से बाहर झाँका तो वो चाँद भी सब देख रहा था
शायद वो भी बेचैन था इससे, जो कुछ हो रहा था

आँगन में कोहरा भी छाया हुआ था
हर उस ठिठुरन में बस तेरा ही एहसास समाया हुआ था

तुझको पाने के लिए मुझको फिर से खोना होगा
शायद एक आखरी बार उस चादर में सोना होगा

आज अर्से बाद ये आँखें नम हुई हैं
शायद तूनें फिर छुआ है कहीं

मन तो बोहोत कुछ चहता है, पर शायद
मायनेय तो वहि रखता है जो ये जीवन पाता है

Botanical Garden Bhubaneshwar

Friday, April 13, 2012

reflections

तेरी हर बात को लिखना चाहता था
डर था कहीं तू खो न जाए इन झंझटों में

मगर कुछ पन्ने तो कोरे ही रह गए
शायद वही हैं जो तुझे भरने थे

कतरा कतरा ये सब भी बह जाएगा
लफ्ज़ दर लफ्ज़ ये गीत भी बन जाएगा

वो धुंधला ख़याल अभी भी ज़हन में है
गर कुछ पास नहीं तो वो पन्ने हैं

उन लफ़्ज़ों पे हक तेरा भी था
जो टूटा वो ख़्वाब मेरी ही था

और लिखने के लिए सियाही कहाँ से लाऊँ
इस ज़िन्दगी को मैं क्या क्या समझाउं 

अब तो जैसे एक गर्द सी है इस फर्श पे
मेरी रूह है जो लौटने का नाम नहीं लेती



Tuesday, April 10, 2012

शहर

I know this will sound more like one of my previous post dated 7th April. But to be honest its not, both carry entirely different theme. I tried to maintain the difference but I guess limited vocabulary didn't allowed me to do the justice. Anyways I've expressed what I was thinking and its history now. Here I go...

जब वो शहर छूटेगा
सालों पुराना एक नाता छूटेगा
एक अतीत एक रिश्ता
एक जहां छूटेगा

जब वो शहर छूटेगा
किताब का वो आखरी पन्ना छूटेगा
साथ ही ये मन और
वक़्त से गिरा वो लम्हा टूटेगा

जब वो शहर छूटेगा
मेरा वो बचपन छूटेगा
साथ ही "आगे बढने" का वो दैत्य
सरेआम मुझको लूटेगा


जब वो शहर छूटेगा
सुख दुःख का वो मेला छूटेगा
एक मैदान एक गलियारा
और एक घरौंदा छूटेगा


जब वो शहर छूटेगा
दादी से वो मिलना छूटेगा
जो खोया जो पाया
उसका अर्थ भी छूटेगा


जब वो शहर छूटेगा
वापसी का वो सपना टूटेगा
एक पता जिसे अपना कह सकू
वो भी छूटेगा


Old Bridge (Courtesy : http://roorkeecityonline.com)

good night!


Over the time I've gained this affinity for nights, while these hostile days continue to appear unfaithful. Since night symbolizes the end of day it might be one reason for such affinity apart from other unexplored ones. It (night) has been unbelievably comfortable, cozy, forgiving, faithful and yes illusive too. After those exhaustive and soul sucking hours of day, a comfortable night was the only respite that could have saved me. The affection grew silently without any fuss. Night after night the closeness increased and with every night there came some thoughts and few dreams for that hungry soul. These thoughts and dreams were nothing but the reflection of what I was going through. The soul wanted to change things, an alternate ending it was asking for and these nights did exactly that. Although not for real but a parallel universe was created where everything seemed perfectly okay. Certainly logic was not the basis of this universe. These nights behaved like an antidote and took away all the poison that was injected during the day. It made me calm and helped me forget all that this soul was finding hard to accept. It seemed like a journey which was hardly about reaching some where. I know I might be wrong on several worldly aspects but who cares until this illusion is keeping me awake. :)


good night!

Saturday, April 7, 2012

garmi ki wo dopahar


गरमी की वो दोपहर याद आती है
उस दोपहर की वो चिलचिलाती धूप याद आती है

स्कूल  के वो ground याद आते हैं
छुट्टी की वो घंटी याद आती है

दोपहर की वो नींद भरी फुर्सत याद आती है
आम और इमली की वो छाओं याद आती है

कैम्पस  की वो सुनसान सड़कें याद आती हैं
घर पहुचने की वो जल्दी याद आती है

माँ की वो डांट याद आती है
बचपन की वो खुराफ़ात याद आती है

घर का वो आँगन याद आता है
आँगन में बिखरा आम का वो बौर याद आता है

सुराही का वो ठंडा पानी याद आता है
कुल्फी बेचने वाला वो चाचा याद आता है

गेंदे की वो क्यारी याद आती है
पानी तलाशती वो गौरैया याद आती है

याद आती है गरमी की वो दोपहर
जो आज हो कर भी नहीं है

अब धूप तसल्ली नहीं देती, चुभती है
अब फुर्सत भूले भटके भी नहीं मिलती है

माँ की डांट सुनने को ये कान तरसते हैं
वो गौरैया दिखे, तो उसको अपनी खुशकिस्मती समझते हैं

अब घर पहुचने की वो जल्दी नहीं रहती
शायद AC केबिन  में कभी गरमी नहीं लगती

लोगों को खुश करने से फुर्सत ही नहीं मिलती
अपनी इच्छाओं पे कभी नज़र ही नहीं पड़ती

प्यास तो आज भी लगती है
लेकिन कुछ भी ऐसा नहीं जिससे ये बुझती हो

अब सड़कें नहीं दुनिया सुनसान दिखती है
कब ये दोपहर बीते और शाम आये बस यही बेचैनी रहती है


Friday, April 6, 2012

khoya khoya chaand - 2

वो जो चाँद था खो गया है कहीं
इन् बादलों ने साज़िश करके 
छुपाया लिया है शायद

बचीं हैं तो बस 
वो बादलों के पीछे से आती किरणें
जो चाँद के होने का झूठा एहसास देतीं हैं

वो झलक तो आज भी याद है
दुनिया कहती है दूर
पर कुछ यादें आज भी मेरे पास हैं

आँखें आज भी ख़ामोश रहती हैं
ये तो मन की ज़ुबा है 
जो रोज़ एक ही कहानी कहती है

फ़ासले तय करने से गुरेज़ कहाँ था
लेकिन बिना मंज़िल का सफ़र होगा
ऐसा भी एहसास कहाँ था

हर रात को अपना बनाने का दिल करता है
अतीत के कुछ मायने हैं
जिनको बदलने का जी करता है  

सपने अब नहीं बेहलाते मुझे
उस चाँद की तरह
ये नींद भी अब पास नहीं मेरे 

सच क्या है झूट क्या था
ये कहाँ मायने रखता है
मेरे चाँद का दीदार रोज़ होता
बस यही ख़याल आया करता है