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Saturday, April 7, 2012

garmi ki wo dopahar


गरमी की वो दोपहर याद आती है
उस दोपहर की वो चिलचिलाती धूप याद आती है

स्कूल  के वो ground याद आते हैं
छुट्टी की वो घंटी याद आती है

दोपहर की वो नींद भरी फुर्सत याद आती है
आम और इमली की वो छाओं याद आती है

कैम्पस  की वो सुनसान सड़कें याद आती हैं
घर पहुचने की वो जल्दी याद आती है

माँ की वो डांट याद आती है
बचपन की वो खुराफ़ात याद आती है

घर का वो आँगन याद आता है
आँगन में बिखरा आम का वो बौर याद आता है

सुराही का वो ठंडा पानी याद आता है
कुल्फी बेचने वाला वो चाचा याद आता है

गेंदे की वो क्यारी याद आती है
पानी तलाशती वो गौरैया याद आती है

याद आती है गरमी की वो दोपहर
जो आज हो कर भी नहीं है

अब धूप तसल्ली नहीं देती, चुभती है
अब फुर्सत भूले भटके भी नहीं मिलती है

माँ की डांट सुनने को ये कान तरसते हैं
वो गौरैया दिखे, तो उसको अपनी खुशकिस्मती समझते हैं

अब घर पहुचने की वो जल्दी नहीं रहती
शायद AC केबिन  में कभी गरमी नहीं लगती

लोगों को खुश करने से फुर्सत ही नहीं मिलती
अपनी इच्छाओं पे कभी नज़र ही नहीं पड़ती

प्यास तो आज भी लगती है
लेकिन कुछ भी ऐसा नहीं जिससे ये बुझती हो

अब सड़कें नहीं दुनिया सुनसान दिखती है
कब ये दोपहर बीते और शाम आये बस यही बेचैनी रहती है