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Sunday, May 15, 2011

बौछार

मैं कुछ कुछ भूलता जाता हूँ अब तुझको
तेरा चेहरा भी धुन्द्लाने लगा है अब तखैयुल 
में

बदलने लग गया है अब वोह सुबह शाम का मामूल
जिसमे तुझसे मिलने का भी एक मामूल शामिल था

तेरे ख़त आते रहते थे 
तो मुझको याद रहते थे तेरे आवाज़ के सुर भी

तेरे आवाज़ को कागज़ पे रखके 
मैंने चाह था के पिन करलूं 
वोह जैसे तितलियों के पर लगा लेता है कोई अपनी एल्बम में

तेरा "बे" को दवाके बात करना
"वाह" पे होठों का छल्ला गोल होके घूम जाता था

बहुत दिन हो गए देखा नहीं
न ख़त मिला कोई
बहुत दिन हो गए
सच्ची...
तेरी आवाज़ की बौछार में भीगा नहीं हूँ मैं

मैं कुछ कुछ भूलता जाता हूँ अब तुझको तेरा   
चेहरा भी धुन्द्लाने लगा है अब ताखायुल में

बदलने लग गया है अब वोह सुबह शाम का मामूल 
जिसमे तुझसे मिलने का भी एक मामूल शामिल था 



I donno why I'am posting this! truly no reason behind ! just loved the piece of poetry and probably that's why its here. 

मामूल  - Routine
तखैयुल  - Visualise
Poet : Gulzar
Story : Lovedale
Movie : Dus Kahaniyaan